Meri kavita mere chitra
Sunday, 20 October 2019
काशी
वासी जहाँ के अविनाशी
है मुक्ति जहाँ खुद मिल जाती
जहाँ बसने को दुनिया आती
वो शहर है अपना *काशी*।
यहाँ बैल को भी पूजा जाता
जो आता यही का हो जाता
जहाँ है दुनिया की सुख राशि
वो शहर है अपना *काशी*।
जहाँ विद्वानों की है खदान
दुनिया में है विख्यात पान
यहाँ रहे तुलसी-कबिरा दासी
वो शहर है अपना *काशी*
काल भैरव हैं कोतवाल
दृष्टि उनकी है त्रिकाल
बना-रस की है दुनिया प्यासी
वो शहर है अपना *काशी*
Bskr twry
है मुक्ति जहाँ खुद मिल जाती
जहाँ बसने को दुनिया आती
वो शहर है अपना *काशी*।
यहाँ बैल को भी पूजा जाता
जो आता यही का हो जाता
जहाँ है दुनिया की सुख राशि
वो शहर है अपना *काशी*।
जहाँ विद्वानों की है खदान
दुनिया में है विख्यात पान
यहाँ रहे तुलसी-कबिरा दासी
वो शहर है अपना *काशी*
काल भैरव हैं कोतवाल
दृष्टि उनकी है त्रिकाल
बना-रस की है दुनिया प्यासी
वो शहर है अपना *काशी*
Bskr twry
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