Sunday, 20 October 2019

गुड़िया

ऐसी थी बचपन की यादों की पुड़िया
ना थी फिक्र खाने की
ना ही नहाने की
ना था पास कुछ भी
ना कुछ भी खो जाने की
वो रातों में रोना और ना फुसलना
किस्से सुनाती दादी वो बुडिया
वो छोटे से बच्चों की नन्ही सी गुड़िया
बहुत याद आती है प्यारी सी गुड़िया।
Bskr twry

काशी

वासी जहाँ के अविनाशी
है मुक्ति जहाँ खुद मिल जाती
जहाँ बसने को दुनिया आती
वो शहर है अपना  *काशी*।
यहाँ बैल को भी पूजा जाता
जो आता यही का हो जाता
जहाँ है दुनिया की सुख राशि
वो शहर है अपना *काशी*।
जहाँ विद्वानों की है खदान
दुनिया में है विख्यात पान
यहाँ रहे तुलसी-कबिरा दासी
वो शहर है अपना *काशी*
काल भैरव हैं कोतवाल
दृष्टि उनकी है त्रिकाल
बना-रस की है दुनिया प्यासी
वो शहर है अपना *काशी*
Bskr twry